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Graho Ki Shatruta/mitrta

ग्रहों की मित्रता/शत्रुता:  Friendship of Planets

वैदिक ज्योतिष में ग्रहों की भी मित्रता और शत्रुता का विचार ग्रहों के आपसी संबंधो से किया जाता हैं और इसी आधार पर ही फलित करना ज़रुरी और सटिक होता हैं। ग्रहों के माध्यम से ही जातक के जीवन के बारे में जाना जा सकता हैं। यही ग्रह शुभता और अशुभता की वज़ह से अपना प्रभाव देते हैं। ब्रहमाण्ड के सात ग्रहों में सभी आपस में शत्रु, मित्र और सम होने का संबंध रखते हैं।        

ज्योतिष का सबसे मुख्य ग्रह सूर्य, चन्द्रमा, मंगल तथा गुरु को मित्र मानता हैं क्योंकि सूर्य राजा हैं उसको चंद्रमा रुपी रानी, मंगल के रुप में सेनापति और सलाकार के रुप में गुरु की ज़रुरत पड़ती हैं और चन्द्रमा एक सौम्य व भावुक ग्रह हैं जिसको सहारे के लिए राजा की मज़बूती भी चाहिए। वहीं गुरु अपने शिष्य के साथ ही चलना पसंद करेगा और मंगल राजा रानी व गुरु की अवहेलना नहीं कर सकता। इसलिए ये चारों ग्रह आपस में मित्रता का सम्बंध रखते हैं। ये सभी ग्रह वैदिक ज्योतिष के अनुसार दैविय ग्रह हैं क्योंकि सूर्य आत्मा, चन्द्रमा मन, मंगल बल/पराक्रम, गुरु नीति/नियम और धर्म का पालन करने वाला हैं।   अपनी जन्म राशि जानें।

चन्द्रमा ग्रह सूर्य के साथ बुध को भी मित्र मानता हैं क्योंकि दोनो का आपस में पिता पुत्र का सम्बंध हैं। लेकिन बुध चंद्रमा को मित्र नहीं मानता हैं क्योंकि चंद्रमा ने अपने पुत्र बुध व उसकी माता तारा के साथ छल करके उनका त्याग कर दिया था। इसी प्रकार बुध अपनी माता के प्रति चन्द्रमा के धर्मविरुद्ध व्यवहार को भुला नहीं पाया। उसे लगा की चन्द्रमा के दुष्कर्म के कारण ही वह वर्णसंकर संतान बना। शायद यही कारण हैं की मिलनसार, बुद्धिमान तथा व्यवहार कुशल बुध एक मात्र चन्द्रमा को ही अपना शत्रु मानता हैं।

वही बुध ग्रह सूर्य को भी मित्र मानता हैं लेकिन सूर्य बुध को सम मानता हैं क्योंकि बुध तामसिक और सूर्य के शत्रु ग्रह शनि को अपना मित्र मानता हैं और बुध की कोई अपनी प्रवृति और अस्तित्व नहीं होती वह जिसके साथ रहता हैं उसी का हो जाता हैं।  

बुध, शुक्र और शनि ये तीनों ग्रह आपस में मित्र ग्रह हैं। वैदिक ज्योतिष अनुसार बुध, शुक्र और शनि को आसूरी वर्ग भी कहा जाता हैं क्योंकि ये सभी ग्रह स्वार्थ व सुख पाने में विश्वास रखते हैं और धर्म को नहीं मानते। बुध तथा शुक्र लौकिक सुख सम्पदा के पीछे भागते हैं तो शनि आलस्य और अकर्मण्यता के कारण धर्म पालन में पिछड़ जाता हैं।            अन्य सवालों के जवाब के लिए हमसें मिलनें के लिए सम्पर्क करें।    

ग्रहों की शत्रुता  Enemies of Planets      

सूर्य, शुक्र तथा शनि को अपना शत्रु मानता हैं क्योंकि सूर्य सात्विकता और प्रजावत्सल राजा हैं। शुक्र थोड़ा स्वार्थी, सुख लोभी तथा कामुक वृति का हैं। शनि यु तो वैरागी हैं किन्तु आलस्य, अकर्मण्यता, वैराग्य व विषाद में डूबे रहने की उसकी प्रवृति उत्साही व कर्मठ सूर्य को तनिक भी नहीं सुहाती जिससे सूर्य का शत्रु शनि ग्रह हैं।   ज्योतिष सीखें।

चंद्रमा ग्रह का कोई भी शत्रु नहीं हैं क्योंकि चन्द्रमा कालपुरुष/परमपिता परमेश्वर का मन हैं और उसका मन भेदभाव करना नहीं जनता। वह तो सभी को मित्र मानता हैं। भले ही कोई कितना बड़ा नास्तिक क्यों न हो परमात्मा उसे भी शत्रु नहीं मानता हैं। उसका एक नाम समदर्शी भी हैं। इसी कारण जो चन्द्रमा के प्रति शत्रु भाव रखते हैं चन्द्रमा उन्हें भी सम मानता हैं शत्रु तो कदापि भी नहीं।    कोई भी सवाल! जवाब के लिए अभी बात करे!

मंगल ग्रह बुध को अपना शत्रु मानता हैं क्योंकि बुध का राजकुमार होकर सुखलोभी व स्वार्थी बन जाना, साहसी पराक्रमी सेनापति मंगल को रास नहीं आता और बुध को भीरु और कायर मानता हैं।

गुरु ग्रह बुध तथा शुक्र को अपना शत्रु मानता हैं क्योंकि गुरु ज्ञान, अध्यात्म, दर्शन और न्याय हैं वह बुध के बुद्धिबल, चातुर्य और व्यवहार कुशलता भरा व्यवहार को पसंद नहीं करता और सात्विक देव गुरु को बुध का सुखलोभी शुक्र से मैत्री सम्बन्ध भी रास नहीं आया। अत: सुखलोभी और वैभव कारक शुक्र के साथ बुध को भी अपना शत्रु मान लिया।

शुक्र ग्रह सूर्य, चन्द्रमा को अपना शत्रु समझता हैं शुक्र ने सूर्य चन्द्रमा को तो शत्रु माना किन्तु मंगल को शत्रु नहीं माना क्योंकि जिस किसी को भी लौकिक सुख सम्पन्नता पाने की इच्छा हो उसे साहस पराक्रम उत्साह की आवश्यकता तो पड़ेगी ही यही कारण हैं शुक्र मंगल को शत्रु नहीं बल्कि सम मानता हैं।    अन्य योगों को जाननें के लिए यहां देखें। 

शनि लौकिक सुख-सुविधा को माया जाल या भ्रम मानता हैं उसे सूर्य, चंद्र, मंगल तनिक नहीं भाते। वह इन्हें अपना शत्रु मानता हैं।

सम ग्रह विचार

जो ग्रह किसी ग्रह के लिए शत्रु या मित्र नहीं हैं उन्हें उन ग्रहों का सम जाने। सूर्य के लिए बुध सम ग्रह हैं। चन्द्रमा के लिए मंगल, शुक्र, शनि तो मंगल के लिए शुक्र और शनि सम ग्रह हैं। बुध, मंगल, गुरु और शनि को सम मानता हैं। गुरु के लिए शनि तो शनि के लिए गुरु सम हैं किन्तु शुक्र, मंगल और गुरु दोनों को ही सम ग्रह मानता हैं।           Click here to know about houses in astrology

ग्रह                          मित्र                         शत्रु                     सम

सूर्य                         चंद्र, मंगल, गुरु          शुक्र, शनि             बुध

चंद्रमा                       सूर्य, बुध                  --                     सभी ग्रह

मंगल                       सूर्य, चंद्र, गुरु             बुध                  शुक्र, शनि

बुध                         सूर्य, शुक्र                   चंद्रमा               शनि, मंगल, गुरु

गुरु                          सूर्य, चंद्र, मंगल          शुक्र, बुध            शनि

शुक्र                          शनि, बुध               सूर्य, चंद्र              मंगल, गुरु

शनि                        बुध, शुक्र               सूर्य, चंद्र, मंगल        गुरु 

 

 

ग्रहों के परम् उच्च अंश

वैदिक ज्योतिष के अनुसार ग्रहों की उच्चता का रहस्य भी बहुत महत्वपूर्ण हैं। जो ग्रह अपने अंशो पर उच्च या नीच का होता हैं उसी अनुसार फल भी देता हैं और फलित में उनका प्रभाव भी वैसे ही मिलता हैं। इसी के आधार पर ही ग्रह अपने शुभ और अशुभ फलो में कमी या बढौतरी भी करते हैं। वही ग्रह उच्च का सरकारी नौकरी पर उच्च पद पर बैठा देता हैं और वही ग्रह नीच का होने पर ज़मादार तक बना देता हैं। आईये जाने कौनसा ग्रह किस ग्रह की राशि में शत्रु होते हुए भी उच्च का होता हैं और मित्र होते हुए भी नीच का होता हैं।        

सूर्य आत्मा का कारक होने से मोक्ष प्राप्ति में ही सफलता देता हैं। अश्वनी नक्षत्र भचक्र की सर्वप्रथम मेष राशि का सर्वप्रथम नक्षत्र हैं जिसका स्वामी केतु मोक्ष का प्रतीक हैं। सूर्य सर्वप्रथम या सर्वोच्च होने के लिए मेष राशि मंगल में मोक्ष देने वाले केतु के अश्वनी नक्षत्र पर आश्रित हैं जिससे वही उच्चता का फल देता हैं।

सूर्य राजा या उच्चपदासीन व्यक्ति हैं जिसे किसी संस्था का अध्यक्ष या घर परिवार का मुखिया भी मान सकते हैं। अध्यक्ष या मुखिया में धैर्य, वीरता शौर्य के साथ भविष्योन्मुखी रणनीति तैयार कर संस्था, देश या परिवार को आगे बढ़ाने, उसकी समाजिक व आर्थिक स्थिति सुधारने की क्षमता होनी चाहिए। वह कठिन संघर्ष कर अपने मेहनत के बल पर अपने आश्रितों का कल्याण करे तब ही श्रेष्ट या उच्च कहलायेगा। केतु तो फ्लेग बेयरर या झंड़ा लेकर आगे चलने वाला हैं जो एक राजा के आगे हमेंशा रहता हैं। नेता का व्यक्तित्व ऐसा हो की वह संस्था या परिवार के मान समान व यश को बढ़ाने वाला बने।

चन्द्रमा मन का नैसर्गिक कारक हैं वह सूर्य के नक्षत्र कृतिका में मानो आत्मसाक्षात्कार या समाधि की स्थिति में पहुंचा कर, वृष राशि (शुक्र) के सुख वैभव को तुच्छ मानने लगता हैं। मन की शक्ति संयम में ही निहित हैं। शुक्र की वृष राशि में, सुख वैभव के बीच अनासक्त भाव से रहकर, आत्मा का दर्शन करना ही चन्द्रमा का परमोच्च स्थान हैं।

चन्द्रमा वृष राशि (शुक्र) कृतिका नक्षत्र (सूर्य) में सर्वोच्च होता हैं। चन्द्रमा मन के साथ जनता, अधीनस्थ कर्मचारियों का भी प्रतीक हैं। कुछ लोग चन्द्रमा को माता या मुखिया का विश्वासपात्र सचिव मानते हैं। जनता को शुक्र के भोग विलास से बच कर, उपलब्ध संसाधन का उपयोग, समाज की उन्नति और विकास में करना चाहिए। इसके लिए सूर्य का सत्वगुण व सदाचार ही उसका बल हैं। सूर्य की रश्मियों में भेद भाव नहीं होता हैं। इसी प्रकार जनता को भी एकजुट रह कर, सरकार के विकासोन्मुखी कार्यक्रम में सहयोग करना चाहिए।

मंगल बल पराक्रम का प्रतीक होकर कर्म व मेहनत के स्वामी शनि की मकर राशि में घनिष्टा नक्षत्र में उच्चता पाता हैं। घनिष्ठा का स्वामी मंगल एक साहसी शूरवीर सिपाही की तरह अपने शत्रु शनि की राशि में उच्चता पाता हैं क्योंकि वह जानता हैं कि कर्म और मेंहनत के बिना कभी शत्रुओं से सफलता नहीं मिलती।   

मंगल मकर राशि (शनि) घनिष्ठा नक्षत्र (मंगल) में उच्च होता हैं। रक्षा कार्यों या निर्माण क्षेत्र में लगे सभी व्यक्ति मंगल से प्रभावित होते हैं सुरक्षा और विकास के लिए कुशल व्यवस्था व प्रबंध दक्षता अनिवार्य हैं। शनि मानो समाज की तलछट या सर्वहरा वर्ग का प्रतीक हैं। मंगल की शक्ति, उसका प्रबंध कौशल गरीब से गरीब व्यक्ति के हित में होता हैं। समाज का सबसे पिछड़ा वर्ग भी आशा, उत्साह के साथ भविष्योन्मुखी विकास कार्यो में अपना योगदान करे। यही मंगल के घनिष्ठा नक्षत्र व शनि की मकर राशि में सेनापति मंगल की उच्चता का रहस्य हैं।

बुध, बुद्धि का कारक होकर, अपनी ही राशि कन्या में, चन्द्रमा के हस्त नक्षत्र में परम् उच्च का होता हैं। मन की कोमल भावनाओं, आत्मीयता, संवेदना, सहानुभूति के बिना शुष्क ज्ञान निर्थक हैं जो शब्दों का मायाजाल मात्र हैं। बुद्धि का उपयोग सामान्यजन के कल्याण में होना ही बुध को उच्चता देता हैं।

बुध कन्या राशि (बुध) हस्त नक्षत्र (चन्द्रमा) में उच्च का होता हैं। बुद्धिजीवीवर्ग, शिक्षक, लेखक, पत्रकार या मिडिया के लोग बुध से नियंत्रण होते हैं। ये अपने ही क्षेत्र में रहकर जनता (चन्द्रमा) के दुःख-सुख से जुड़े, अपने ज्ञान और अनुभव से जनता की समस्याएं सुलझाने, उसे सुखी और सम्पन्न बनाने के तरीके खोजे यही बुध की उच्चता हैं। बुध खेल कूद तथा परिवहन या टेलीकॉम का भी कारक हैं।

गुरु चन्द्रमा की कर्क राशि और शनि के पुष्य नक्षत्र में परम् उच्च होता हैं। गुरु धर्म, दर्शन व् अध्यात्म का कारक होकर मन से संबंध कर, मन को अध्यात्म की और मोड़े तो निश्चय ही शुभ हैं। गुरु कही लौकिक सुख में फंसे नहीं इसके लिए शनि का वैराग्य, अनासक्ति भोगों को तुच्छ मानने के लिए [शानि का] हस्त नक्षत्र उसके लिए सर्वाधिक उपयुक्त हैं। 

गुरु कर्क राशि (चन्द्रमा) पुष्य नक्षत्र (शनि) में उच्च का होता हैं। गुरु निति, नियम तथा न्याय के साथ वित् व्यवस्था का भी प्रतिनिधि हैं। न्यायपालिका तथा वित् प्रबंधक का उदेश्य जनता (चन्द्रमा) के सर्वहरा वर्ग (शनि) के कल्याण व सुविधा के साथ अनुरूप हो तभी गुरु को उच्चता मिलेगी।

शुक्र सुख वैभव तथा भोगो का कारक, गुरु की मीन राशि में बुध के रेवती नक्षत्र में परम् उच्च का होता हैं। भोगी शुक्र को गुरु के अध्यात्म व ज्ञान की आवश्यकता तो पड़ेगी ही और बुध का नक्षत्र जातक की बुद्धि को भोगो में भटकने से रोकेगा। शायद तब ही प्राप्त सुख, वैभव का उपयोग जनकल्याण व धर्म के कार्यो में हो सकेगा। यही शुक्र की सफलता की कसौटी भी हैं।

शुक्र मीन राशि (गुरु) रेवती नक्षत्र (बुध) में उच्च का रहता हैं। कला, मनोरंजन या सुख-सुविधा तथा सौंदर्य प्रसाधन का कारक शुक्र नीति व न्याय के अनुकूल, अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने वाला (गुरु) तथा बुद्धि बल व बालवर्ग (बुध) के हित में हो, तभी शुक्र उच्च माना जायगा।

शनि निर्धन व सर्वहारा वर्ग का प्रतीक हैं। वह शुक्र की तुला राशि में गुरु के विशाखा नक्षत्र में परम् उच्च होता हैं। शनि निष्ठावान सेवक हैं, शुक्र के हास-विलास के बीच, गुरु के चरणों में बैठ कर, अध्यात्म व दर्शन को व्यवहार में ढ़ालना, धर्म को क्रियान्वित करना ही शनि की सफलता हैं। गुरुजन कहते हैं की शनि शबरी सरीखा हैं जिसने रामजी को बेर के रूप में मानो अमृत पिलाया। शनि शायद कंस की कुब्जा दासी भी हैं जिसने कृष्ण को पाया। गुरु के नक्षत्र में यदि कालपुरुष का सेवक शनि उच्चता पाए तो आश्चर्य कैसा।      

शनि तुला राशि (शुक्र) विशाखा नक्षत्र (गुरु) में उच्च का होता हैं। श्रमिक वर्ग को भी न्यूनतम सुख सुविधाएं (शुक्र) प्राप्त हो, वे सम्मानपूर्वक जीवनयापन करे। नीति, नियम और अर्थ व्यवस्था ऐसी हो जिससे समाज का निचला वर्ग भी उन्नति करे। उसी परिस्थिति में शनि को उच्च कहा जायगा। कर्मचारियों या श्रमिक (शनि) का धर्म (गुरु) हैं की वह समाज को सुख सुविधाएं जुटाने में सहायता करे। 

 ग्रह                                   उच्च(राशि)                                       नीच(राशि)

सूर्य                                         मेष                                                 तुला

चंद्रमा                                      वृषभ                                                वृश्चिक

मंगल                                       मकर                                                कर्क

बुध                                         कन्या                                                मीन

गुरु                                          कर्क                                                 मकर

शुक्र                                        मीन                                                 कन्या

शनि                                        तुला                                                  मेंष

 

 


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